नेताजी और आज़ाद हिन्द फ़ौज 

यह सुस्पष्ट है की भारतीय इतिहास कि बहुत सी महत्वपूर्ण घटनाओं को इतिहास में इतना श्रेय नहीं दिया गया, जिसके वे हक़दार हैं | साम्यवादी इतिहासकारों ने मौर्यों ,मुग़लों और अंग्रेज़ों को तो खूब गाया, परन्तु शक्तिशाली साम्राज्यों जैसे चोला, सातवाहन, चालुक्य, विजयनगर, अहोम और मराठों को भारतीय इतिहास में समादर नहीं दिया | ऐसी ही एक महत्वपूर्ण घटना है लाल किले में हुए आज़ाद हिन्द फ़ौज के मुकदमों की |

5 नवंबर 1945 को लाल किले में आज़ाद हिन्द फ़ौज के तीन प्रमुख अफसरों लेफ्टिनेंट कर्नल प्रेम कुमार सहगल, लेफ्टिनेंट कर्नल गुरबक्श सिंह ढिल्लों  और मेजर जनरल शाह नवाज़ खान के ऊपर मुक़दमे चलाये गए | हारी हुई आज़ाद हिन्द फ़ौज के अफसरों को सजा देने के लिए चलाये गए इन मुकदमों  का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में  बहुत प्रभाव पड़ा और ये ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की आखिरी कील  साबित हुए | आज़ाद हिन्द फ़ौज के लिए, भारतीय समाज के हर वर्ग से मिले अभूतपूर्व सहयोग, सहानुभूति और सार्वजनिक प्रशंसा ने स्वतंत्रता को ब्रिटिश पंजों से छीन लिया | भारतीय समुदाय में खासकर ब्रिटिश भारतीय सेना को जाग्रत करने में लाल किले के मुकदमों का योगदान अतुलनीय है |

यह आश्चर्यजनक है कि1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजो ने कैसे 90 वर्षों तक भारत को बेड़ियों में जकड़े रखा | डेढ़ साल से भी लम्बे चले विद्रोह को, अंग्रेजो ने बड़ी क्रूरता से, वफादार भारतीय शासकों की मदद से कुचल दिया और 1859 में समस्त भारत को ब्रिटिश झंडे के अधीन कर दिया | परन्तु इस विद्रोह ने अंग्रजों को हिला कर रख दिया और उन्होंने इससे अपनी सत्ता कायम रखने के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें सीखी |

पहला, हमेशा ही भारतीय राजनैतिक नेतृत्व को धर्म के आधार पर विभाजित रखो | क्योंकि वे देख चुके थे कि क्या हुआ था, जब 1857 में नाना साहब- बहादुरशाह जफ़र, तात्या टोपे- फिरोज शाह, लक्ष्मी बाई –  बेगम हज़रत महल ने उनके खिलाफ मिल गए थे | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक धर्म निरपेक्ष राजनैतिक संगठन था, जिसमे मुस्लिम प्रतिनिधित्व भी पर्याप्त था| इसके बावजूत मुस्लिम लीग जिसका उद्देश्य राजनैतिक लाभ के लिए मुस्लिम समुदाय कि भावनाओं का शोषण करना था, उसे अंग्रेजो द्वारा निरंतर प्रोत्साहन और सहयोग दिया गया | ये इसलिए ताकि भारत में कभी भी राजनैतिक एकता न आ सके | नेताजी बोस ने कांग्रेस और फारवर्ड ब्लॉक के अध्यक्ष के रूप में सदा ही इस राजनैतिक एकता को हासिल करने का प्रयास किया और मुस्लिम लीग तथा अन्य कई धार्मिक संगठनों को एक छत्र के नीचे लाने के लिए समझौते भी किये |

दूसरा, 562 रियासतों को विशेषाधिकार देकर उनसे सौहाद्रपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखना | ये रियासतें ही 1857 की  क्रांति के दौरान अंग्रेजो की वफादार रहीं और क्रांति को कुचलने में महती भूमिका निभाई|  इसलिए अंग्रजों ने भी इनके नाममात्र के अधिकारों और नाज़ुक सत्ता को खत्म नहीं किया | इसके बदले में रियासतों के शासकों ने भी 90 वर्षो के ब्रिटिश राज के दौरान किसी भी प्रकार की बगावत को भड़कने नहीं दिया | राजनैतिक तौर पर रियासतों का अंग्रेजी हुकूमत में कोई हस्तक्षेप नहीं था और सैन्य दृष्टि से उन्हें एक सैनिक दस्ता रखने का अधिकार था | ये सैन्य दस्ता इम्पीरियल सर्विसेज ट्रूपर्स कहलाता था और पूर्ण रूप से ब्रिटिश इंडियन आर्मी के अधीन था | रियासतों के होने से अंग्रेजों को भी कानून व्यवस्था और कर संग्रह में मदद मिलती थी | रियासतें अपने विशेषाधिकारों को कायम रखना चाहती थीं, इसलिए कभी भी आज़ादी के संग्राम में भागीदार नहीं हुईं और अंग्रेजों द्वारा अपनी ही प्रजा का शोषण नहीं रोका | गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट 1935 के तहत, इन विशेषअधिकारों में वृद्धि की गई और रियासतों को पहले की तुलना में कहीं ज्यादा स्वायत्ता प्रदान की गई | रियासतों और अन्य देश पर अंग्रेजों के इस भेदभावपूर्ण  व्यव्हार का नेताजी ने भारी विरोध किया और सभी दलों के साथ मिलकर एक देश और एक अधिकार के मत को बढ़ावा दिया |

नारंगी रंग में रियासतें |

तीसरा, 1857 की क्रांति के बाद सबसे महत्वपूर्ण बात जो अंग्रेजों ने सीखी वह ये कि फ़ौज के भारतीय सिपाहियों को हर हाल में राजनैतिक प्रभाव से दूर रखना और कभी भी उनकी धार्मिक भावनाओं के साथ न खेलना |

सेना की टुकड़ियों (रेजिमेंट्स) को इस तरह से गठित किया था, जिसमे एक ही जात और धर्म के लोग हों | हर एक रेजिमेंट को खाने और रहने कि अलग सुविधा दी गई थी | अंग्रेजो ने रेजिमेंट्स के प्रति श्रद्धा के भाव को बढ़ावा  दिया और सभी सैनिकों की वफ़ादारी को रेजिमेंट्स से जोड़ दिया | रेजिमेंट की परंपरा और ओहदा ही सिपाहियों के लिए सब कुछ था, जिसके लिए वे जान दे सकते थे | भारतीय सिपाही ही अंग्रेजों की वो अजेय तलवार थे, जो हर तरह की क्रांति और जनआंदोलन को काटने में सक्षम थे | जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919), किस्सा कवानी बाजार हत्याकांड, पेशावर (1930) और दर्जनों हत्याकांडों में चाहे वो शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज ही क्यों न हो, तमाम वाकयों में हुक्मरान अंग्रेज थे, परन्तु अंजाम देने वाले भारतीय सिपाही ही थे |

ये आश्चर्यजनक है कि कैसे ब्रिटिश भारतीय सेना की 57 बटालियन, सम्पूर्ण देश में चल रहे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से प्रभावित नहीं हुईं और आंदोलन को पूरी तरह से तोड़ने मे महती भूमिका निभाई | वहीं ब्रिटिश आर्मी की 60 रेजिमेंट्स की 550 बटालियनों ने द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लिया | विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों को अपने आकाओं से भेद भाव और धोखा ही मिला | यहाँ तक की उन्हें यूरोप, उत्तर अफ्रिकाऔर दक्षिण- पूर्वी एशिया में हारे हुए रण- क्षेत्रों से सुरक्षित निकाला भी नहीं गया | डाँक्रीक, फ्रांस, 1940 में जब जर्मनों ने अंग्रेजो व फ्रांसीसियों को शिकस्त दी, तब वहां अंग्रेजो के लिए लड़ रहे,  एक चौथाई से ज्यादा भारतीय सिपाहियों को इसलिए नहीं निकाला गया, क्योंकि अंग्रेजों ने अपने फ़्रांसीसी सहयोगियों को सुरक्षित निकालने को प्राथमिकता दी | गुलाम सैनिकों की जान की कीमत सस्ती थी, इसलिए उन्हें दुश्मन के हवाले मरने के लिए छोड़ दिया गया |

एक ही रेजिमेंट के अंग्रेज और भारतीय सिपाही में हो रहे भारी भेदभाव के बावजूद, भारतीय सैनिकों ने अपनी वफ़ादारी नहीं खोई| सन 1941, जर्मन अधिकृत यूरोप में सुभाष चन्द्र बोस ने Free India Legion की स्थापना की | उन्होंने भारतीय युद्ध बंदियों को अपनी स्वेच्छा से इसमें शामिल होने का आवाहन  किया | तब बमुशिकल 3 से 4 हज़ार सिपाही ही इसमें शामिल हुए और अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए | जर्मन और रूसी सहयोग से नेताजी ने अफगानिस्तान के रास्ते पेशावर- लाहौर, फिर दिल्ली पर हमले की योजना बनाई | परन्तु यकायक ही जर्मनी ने सोवियत रूस पर हमला कर दिया | इसके कारण नेताजी को मिला रूसी सहयोग समाप्त हो गया और उन्हें आगे की योजना को रोकना पड़ा |

Free Indian Legion, Germany

नेताजी निराश नहीं हुए और जर्मनी के सहयोगी जापान से आगे की रणनीति बनाने लगे | फ़रवरी 1942 में वो जर्मन यू बोट पर सवार होकर, यूरोप से दक्षिण पूर्वी एशिया के लिए निकले | जापानियों ने बर्मा, मलेशिआ और सिंगापुर में अंग्रेजों को परास्त कर दिया था और काफी तादात में ब्रिटिश फ़ौज के भारतीय युद्ध बंदियों को कैद कर रखा था | सिंगापुर पहुंचने पर नेताजी ने आज़ाद हिन्द अभियान को अपने हांथों में लिया | आज़ाद हिन्द फ़ौज का पुनर्गठन किया जिसमे 30 से 40 हज़ार भारतीय युद्ध बंदी  शामिल हुए |

उन्होंने 21 ऑक्टूबर 1943 को अर्ज़ी हुकूमते आज़ाद हिन्द (आज़ाद हिन्द सरकार) का गठन किया और बर्मा, मलाया व् सिंगापुर में रह रहे 25 लाख भारतीय मूल के निवासियों का विश्वास हासिल किया | नेताजी के आवाहन पर हज़ारों की तादात में लोग आज़ाद हिन्द फ़ौज और सरकार के प्रबंधन में शामिल हुए और मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए सहयोग राशि प्रदान की |

आज़ाद हिन्द सरकार को 9 राष्ट्रों ने मान्यता दी | वे थे जर्मनी, जापान, इटली, क्रोएटिया, थाईलैंड, बर्मा , मंचूको, फिलीपीन्स और आयरलैंड | दिसंबर 1943 में जापान ने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूहों का अधिकार और प्रबंधन आज़ाद हिन्द सरकार को सौंप दिया | आज़ाद हिन्द सरकार एक मजबूत तंत्र था |

इसमें पांच मुख्य मंत्रालय थे-

वित्त मंत्रालय, रक्षा और युद्ध मंत्रालय, कानून मंत्रालय, महिला सशक्तिकरण विभाग और प्रचार-प्रसार विभाग

आज़ाद हिन्द सरकार का खुद का बैंक , मुद्रा , चिकित्सालय , न्यायालय और राष्ट्रीय योजना आयोग भी था | आज़ाद हिन्द सरकार के इस शक्तिशाली ढांचे ने भारतीय सशस्त्र क्रांति को असाधारण वैधता दी |

आज़ाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों में किसी भी तरह का धार्मिक या जातिगत भेदभाव नहीं किया गया था | सभी को सिर्फ एक ही मिट्टी की संतान समझा जाता था और इसलिए मजहब के अनुसार अलग रहने और भोजनालय की कोई सुविधा नहीं दी गई थी |

फ़ौज को रणनीतिक दृष्टि से मुख्यतः चार ब्रिगेड्स में बांटा गया था- गाँधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड, आज़ाद ब्रिगेड और सुभाष ब्रिगेड | ब्रिटिश इंडियन आर्मी की तरह रेजीमेंट्स को रंग और जाति के आधार पर नहीं बांटा गया था|

  एक रेजिमेंट में बंगाली, पंजाबी, मराठी, पठान और तमिल सभी तरह के लोग शामिल थे | फ़ौज का ध्येय वाक्य- “इत्तेफाक, एतमाद और कुर्बानी “(एकता ,विश्वास और त्याग) था, जो राष्ट्र प्रेम को बढ़ावा देता था, रेजीमेंट्स के प्रति श्रद्धा को नहीं |

नेताजी बोस, सिंगापुर में फ़ौज का निरीक्षण करते हुए |

सन 1944 में आज़ाद हिन्द फ़ौज ने जापानी फ़ौज के साथ, बर्मा के रंगून से अंग्रेजो के खिलाफ मुहिम शरू की | आज़ाद हिन्द फ़ौज ने मणिपुर और नागालैंड के कई क्षेत्रों में विजय हासिल की और प्रबंधन को संभाला |

आज़ाद हिन्द फ़ौज के विशेष ‘बहादुर’ दस्तों ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी के कई जवानों को अपने में शामिल करने का कार्य किया | अमेरिका और ब्रिटिश फौजों ने अपनी आधुनिक वायु सेना के साथ भारतीय मोर्चों पर जम कर प्रहार किया| मई 1945 में जर्मनी ने आत्मसमर्पण कर दिया| अंतर्राष्ट्रीय परिस्तिथि अब  जापान के लिए अधिक कठिन हो गई और उसे आज़ाद हिन्द फौज के साथ भारत से पीछे हटना पड़ा |

आज़ाद हिन्द फ़ौज ने बर्मा में अपनी लड़ाई जारी रखी और मोर्चेबंदी बनाये रखी | 15 अगस्त 1945 को परमाणु हमले के बाद जापान ने भी आत्म समर्पण कर दिया | सोवियत रूस पहले से ही नेताजी और भारत की आज़ादी का हिमायती रहा था | आज़ाद हिन्द फ़ौज को अब आगे के अभियान के लिए रुसी सहयोग की आवश्यकता थी | इसी सिलसिले में नेताजी ने रूस जाने की योजना बनाई, परन्तु 18 अगस्त 1945 को तथाकथित विमान दुर्घटना में शहीद हो गए |  युद्ध के दौरान लगभग 16  हज़ार आज़ाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों को पकड़ा गया और भारत वापस भेजा गया | उन्हें भारत के अलग अलग हिस्सों जैसे पंजाब में मुल्तान और अटॅक , पुणे में खड़की , बंगाल में कलकत्ता, नीलगंज, झिंगरगच्छ, और दिल्ली के लाल किले और बहादुरगढ़ में कैद किया गया |

मोइरांग कंगला – मणिपुर में जीत की निशानी

अंग्रेज़ों ने नेताजी और आज़ाद हिन्द फ़ौज की गतिविधियों की ख़बरों को प्रतिबंधित कर रखा था | इसलिए अधिकांश भारतवासी इससे अनजान थे |

परन्तु लाल किले के मुकदमों ने इस रिक्त स्थान को भर दिया | आज़ाद हिन्द फ़ौज के तीन अफसरों पी के सहगल ,जी एस ढिल्लों , शाह नवाज़ खान पर हत्या व अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ने का आरोप लगाया गया |

अंग्रेज़ों का उद्देश्य आज़ाद हिन्द फ़ौज के लोगों को हत्यारा और गद्दार साबित करके सरेआम फांसी देने का था | ताकि लोगों के दिल दहल जाएं और फिर आगे कभी ऐसा प्रयास न हो | हालाँकि अंततः अंग्रेज़ो को, राष्ट्रीय आत्मा को इस तरह क़त्ल  करने का प्रयास बहुत महंगा पड़ा | मुक़दमे के दौरान पेश किये गए सबूतों और दोषियों व् चश्मदीद गवाहों के बयानात से नेताजी और आज़ाद हिन्द फ़ौज का मकसद और योगदान समस्त देश के सामने विधिवत  प्रस्तुत हुआ |

अनजाने में ही मुकदमें की कार्यवाही ने, आज़ाद हिन्द फ़ौज को देश की आज़ादी के प्रति समर्पित सच्ची भारतीय सेना का मुकाम दिलवाया | मुकदमों ने स्वतंत्रता के लिए भारतीय समुदाय की प्यास को और बढ़ा दिया | आज़ाद हिन्द फ़ौज  के सिपाही अब देश के नायक थे | उनके लिए  समस्त देश में असंख्य जनसभाएं और सत्याग्रह किये गए |

आज़ाद हिन्द फ़ौज के समर्थन में सभी राजनीतिक दलों भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस , मुस्लिम लीग ,हिन्दू महा सभा और अकाली दल ने विशाल रैलिया और सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन किये | पिछले  90 वर्षों में पहली बार किसी मुद्दे को लेकर राजनैतिक  एकता देखी गई, और वो मुद्दा था “आज़ाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों की आज़ादी ” |

लाल किले के मुकदमों को लड़ने के लिए, देश के सर्वश्रेष्ठ वकीलों सर तेजबहादुर सपरु, भूलाभाई देसाई, डॉ के एस काटजू , एम् आसफ अली, पंडित जवाहरलाल नेहरू की एक कमिटी बनी| इसे  “इंडियन नेशनल आर्मी  डिफेन्स कमिटी ” या INA कमिटी कहा गया | 

INA कमिटी ने पूरी ताकत और मेहनत से आज़ाद हिन्द फ़ौज के पक्ष को प्रस्तुत किया और उन्हें कम से कम सजा दिलाने की वकालत की | आश्चर्य की बात है क़ि आज़ाद भारत में आज़ाद हिन्द फ़ौज को समर्पित कोई खास दिन नहीं है , परन्तु 1945 – 46  की सर्दियों में हर अगला दिन, देश के किसी न किसी कोने में आज़ाद हिन्द फ़ौज दिवस या INA  day के नाम से मनाया जाता था | कांग्रेस द्वारा आयोजित INA सप्ताह(5 – 12 नवंबर) में अकेले देशप्रिय पार्क कलकत्ता में करीब सात लाख लोग शामिल हुए |

लाल किले के मुकदमों से निकलते हुए INA डिफेन्स समिति के सदस्य

नेताजी का ये प्रबल मत था कि ब्रिटिश इंडियन आर्मी, नेवी और वायुसेना के जवानों का सशस्त्र विद्रोह निश्चित रूप से अंग्रेजी हुकूमत की नीव हिला देगा |

आज़ाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों की आज़ादी के लिए देश में हो रहीं उथल पुथल से इस बार तीनो सेनाओं के जवान भी प्रभावित हुए | आज़ाद हिन्द फ़ौज की दास्तान जानकर, ब्रिटिश सेना के भारतीय जवानों का नजरिया अपने दायित्व को लेकर बदल गया | वे एक नयी राजनैतिक जागरूकता का मंथन करने लगे और अपनी आज़ादी और अधिकारों के विषय में सोचने लगे | अंग्रेजों का दुष्प्रचार कि उन्होंने जापानियों और आज़ाद हिन्द फ़ौज से भारत की रक्षा की है गलत साबित हुआ |

भारतीय सिपाहियों को अहसास हुआ कि उनका अंग्रेजों के पक्ष में लड़ना एक बहुत गलत निर्णय है और यदि उन्होंने अभी भी आज़ाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों की आज़ादी के लिए विद्रोह न किया तो उनकी कुर्बानी व्यर्थ जाएगी | आज़ाद हिन्द फ़ौज के प्रति बढ़ती सहानुभूति और इससे उपजी बेचैनी ही 1946 के प्रारम्भ में हुई सशस्त्र सेनाओं के विद्रोह का प्रमुख कारण बनी |

भारी राजनैतिक और जन दबाव के चलते, जल्द ही लाल किले के पहले आम मुकदमें को खत्म करना पड़ा और तीनो अफसरों सहगल, ढिल्लों, शाहनवाज़ को आज़ाद कर दिया गया | उन्हें ब्रिटिश इंडियन आर्मी से निकाल दिया गया, जिसके वो तब वैसे भी हिस्सा नहीं थे | जनता ने जगह जगह उन तीनो का भव्य स्वागत किया| लाहौर में हुए एक शानदार स्वागत समारोह में तीनों ने एक ही जग से पानी पीकर, देश को एकता का सन्देश दिया |

लाहौर में होता सहगल, ढिल्लों और शाह नवाज़ का भव्य स्वागत |

आज़ाद हिन्द फ़ौज के कई अफसर और सिपाही अभी भी कैद में थे | रॉयल इंडियन नेवी के भारतीय नाविकों ने आज़ाद हिन्द फ़ौज की रिहाई और भारतीय सैनिकों के साथ हो रहे भेदभाव का जबरजस्त विरोध किया | 18  फरवरी 1946 को नेवी के भारतीय अफसरों व् नाविकों ने जंगी जहाजों और प्रमुख केंद्रों पर कब्ज़ा कर विद्रोह प्रारम्भ किया |

चंद दिनों में बम्बई से शरू हुई ये क्रांति, कराची , कोचीन , त्रिवेंद्रम ,मद्रास ,विशाखापट्नम, कलकत्ता आदि प्रमुख केंद्रों में फ़ैल गई | नेवी की इस क्रांति के दौरान 78 जंगी जहाजों और 27 प्रमुख केंद्रों को 20,000 से ज्यादा भारतीय नाविकों ने अपने कब्जे में ले लिया और उनपर तिरंगा फहरा दिया | अंग्रेजी हुकूमत क्रांति को दबाने के लिए बेचैन हो उठी | तभी 20 फरवरी 1946 को वायु सेना के 1200 जवान विद्रोहियों के समर्थन में आगे आये और उन पर किसी भी प्रकार का हवाई हमला करने से इंकार कर दिया | कराची में गोरखा और बलूच रेजीमेंट्स के भारतीय जवानों ने विद्रोहियों पर हमला करने से इंकार कर दिया | आर्मी और वायु सेना की ट्रांसपोर्ट टुकड़ियों ने अंग्रेज सिपाहियों को विद्रोहियों से लड़ने ले जाने से इंकार कर दिया |  विद्रोहियों और अंग्रेजों के बीच कई झड़पे हुई, कई नाविक शहीद हुए , पर अंग्रेज विद्रोह को दबा न सके |  अब अंग्रेजी हुकूमत के लिए, कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनैतिक दखलंदाजी के बिना, विद्रोह को ख़त्म करना नामुमकिन हो गया | देश भर में विद्रोह की खबर फ़ैल गई और जगह जगह आंदोलन होने लगे | अंग्रेजों की दरखास्त पर ,23 फरवरी 1946 को बम्बई में सरदार वल्लभ भाई पटेल नेवी की विद्रोही समिति से मिले और उन्हें आज़ाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों की आज़ादी और नाविकों के अधिकारों से सम्बंधित अन्य मुद्दों पर आश्वस्त किया तथा विद्रोह को शीघ्र ही खत्म करने की मांग की | कलकत्ते में मुस्लिम लीग ने भी विद्रोहियों से क्रांति ख़त्म करने की मांग की | नेवी का विद्रोह ख़त्म हुए एक सप्ताह ही हुआ था कि जबलपुर स्थित सिग्नल कॉर्प के 1700 जवानों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया | विद्रोह के दौरान 80 जवान शहीद और 30 जवान घायल हुए | ब्रिटिश ख़ुफ़िया विभाग ने इसी तरह के कुछ और विद्रोह होने कि शत प्रतिशत आशंका जताई |

रॉयल इंडियन नेवी का विद्रोहों 18 फरवरी 1946

सशस्त्र सेनाओं के विद्रोहों ने अंग्रेजों को हिला कर रख दिया | हालत कुछ इस तरह के हो गए थे कि अंग्रेज सैन्य और राजनैतिक दृष्टि से भारत पर कब्जा बनाये रखने की स्थिति नहीं थे | फ़ौज के भारतीय सैनिकों की वफ़ादारी अब एक बहुत गंभीर प्रश्नचिन्ह थी | अंग्रेजों को एक बार फिर से 1857 का खौफ सता रहा था | अंग्रेज अब किसी तरह की क्रांति तो दूर, किसी मामूली असहयोग या सत्याग्रह आंदोलन को काबू करने की स्थिति में नहीं थे | इस गंभीर समस्या को आननफानन में ही लन्दन की ब्रिटिश लोक सभा में उठाया गया और भारत को आज़ाद करने का निर्णय लिया गया | मार्च 1946 में ही कैबिनेट मिशन के सदस्यों को ये काम सौपा गया, जिसे अंग्रेजों ने शक्ति का स्थानांतरण (ट्रांसफर ऑफ़ पावर) नाम दिया, पर सच मायनो में यह शक्ति का समर्पण (सरेंडर ऑफ़ पावर) था |

भारतीय सशस्त्र सेनाओं के विरोध ने अन्य कई ब्रिटिश अधीन देशों जैसे बर्मा,मलेशिया,सिंगापुर,इंडोनेशिया,मिश्र,इराक और हांगकांग के लिए स्वतंत्रता का मार्ग खोल दिया | इन देशों में बिना भारतीय सिपाहियों के कब्जा बनाये रखना अंग्रेजों के लिए नामुमकिन था | हालाँकि आज़ाद भारत या पाकिस्तान ने इस महत्वपूर्ण अध्याय को लगभग भुला दिया | यहाँ तक कि विद्रोही सिपाहियों या नाविकों को दोबारा सेना में शामिल करना तो दूर, उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा भी नहीं दिया गया | भारत ने प्रचार किया की उसने अहिंसात्मक सत्याग्रह से स्वतंत्रता हासिल की और पाकिस्तान ने इसका कारण मुस्लिम राष्ट्रवाद की बढ़ती मांग को बताया | और इस तरह से नेताजी और उनकी आज़ाद हिन्द फ़ौज का योगदान इतिहास के पन्नों से भुला दिया गया | पर क्या सत्य मिटाये भी कभी मिटा है , वो अमिट है, अटल है, शाश्वत है | हम पूरे दावे से कह सकते हैं कि सशस्त्र सेनाओं का विद्रोह ही अंग्रेजी हुकूमत की ताबूत की आखिरी कील थी और जिस हथौड़े से प्रहार हुआ वह आज़ाद हिन्द फ़ौज थी और प्रहार करने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे |

जय हिन्द!

References:

1. History and Culture of the Indian People published by the Bharatiya Vidya Bhawan.

2. The Ocean of Churn by Sanjeev Sanyal.

3. His Majesty’s opponent by Sugatha Bose.

4. Chalo Delhi by Netaji Research Bureau.

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Nikhil Nayak

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Poetry is my passion. I not only love the craft of the poetry but also the music of language. People around me always suggested me to create a space to preserve/ share my art which is consistent, trusted and tasteful, where other writers and readers can discover my voice. My own life has been positively altered when I discovered a writer that was able to say something in such a way that caused me to shut up and pay attention. Though I’m not a regular writer but still would love to share my thoughts, my work with you all. Blog info nayaknikhil.wordpress.com
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